शायरीःजख्म-ए-मोहब्बत

गर तुमने मुझे समझा होता
‘काबिल-ए-मोहब्बत’
तो छोंड़ न जाते मुझे
‘बीच-ए-समन्दर’

वक्त की जरूरत ने मुझे
मरने न दिया
नहीं तो डूब जाता मैं
उसी में
‘ऐ -बे-मुरब्बत’
तेरे जख्म लेकर ।
– आनन्द कुमार

7 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/07/2016
    • आनन्द कुमार ANAND KUMAR 08/07/2016
  2. mani mani 08/07/2016
    • आनन्द कुमार ANAND KUMAR 08/07/2016
  3. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 08/07/2016
  4. sarvajit singh sarvajit singh 08/07/2016

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