ये वो कली है जो अब मुरझाने लगी है..

कश्ती समंदर को ठुकराने लगी है..
तुमसे भी बगावत की बू आने लगी है..

मत पूछिए क्या शहर में चर्चा है इन दिनों..
मुर्दों की शक्ल फिर से मुस्कुराने लगी है..

मैं सोचता हूँ इन चबूतरों पे बैठ कर..
गलियाँ बदल-बदल के क्यूँ वो जाने लगी है..

गुजरे हुए उस वक़्त की बेशर्मी मिली थी कल..
वो आज की हया से भी शर्माने लगी है..

किस चीज को कहूँ अब इंसान बताओ..
ये वो कली है जो अब मुरझाने लगी है..

-सोनित

5 Comments

  1. babucm C.m.sharma(babbu) 07/07/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/07/2016
  3. Basudeo Agarwal Basudeo Agarwal 08/07/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 08/07/2016

Leave a Reply