क्यो कहते हो मुझे दूसरी औरत

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

मै गुमनाम रही, कभी बदनाम रही
मुझसे हमेशा रूठी रही शोहरत,
तुम्हारी पहली पसंद थी मै
फिर क्यो कहते हो मुझे दूसरी औरत ||

ज़ुबान से स्वीकारा मुझे तुमने
पर अपने हृदय से नही,
मै कोई वस्तु तो ना थी
जिसे रख कर भूल जाओगे कहीं
अंतः मन मे सम्हाल कर रखो
बस इतनी सी ही तो है मेरी हसरत
पर क्यो कहते हो मुझे दूसरी औरत||

तुम्हारे प्यार के सागर से
मिल जाते अगर दो घूट
अमृत समझ कर पी लेती
फिर चाहे जाते सारे बँधन छूट
खुदा से मांगती तो मिल गया होता
तुमसे माँगी थी थोड़ी सी मोहब्बत
पर क्यो कहते हो मुझे दूसरी औरत|| (प्रथम भाग)

14 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/07/2016
    • shivdutt 07/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/07/2016
    • shivdutt 07/07/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 07/07/2016
    • shivdutt 07/07/2016
  4. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 07/07/2016
    • shivdutt 07/07/2016
  5. babucm C.m.sharma(babbu) 07/07/2016
  6. mani mani 07/07/2016
    • shivdutt 08/07/2016

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