ईरोम शर्मीला चानु के लिए

उसकी पेट में भी
भूख है
धू-धू कर
आग जल रहा है
हाँ -हाँ शेर के जैसी भूख
मुह फाड़ कर खड़ा है
उसकी पीठ से भीड़ा पेट में

गरम भात की नहीं
एक टुकड़ा सुखी
रोटी का भी नहीं
मान और ईज्जत
पाने का भी नहीं

उसकी पेट में है
समाज को सुख से
रखने की भूख
सभी को समान
अधिकार मिले
गरीब भूखे पेट
न रहे
उन्हे भर पेट भोजन मिले
उसका भूख.

4 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/07/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/07/2016
  3. sarvajit singh sarvajit singh 06/07/2016
  4. babucm C.m.sharma(babbu) 06/07/2016

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