प्यार के किस्से

दो आँखों से दिखी नहीं, दो आँखें और चढ़ा लीं,
बुढ़ापे की लाठी ने जवानी की दौड़ लगा ली,
जैसे खबर मिली दिल धक-धक, धक-धक दौड़ा,
याद आ गयी पुरानी बातें फिर रुक गया थोड़ा,
निकल पड़ी तांगे पर तुम मैं पीछे-पीछे दौड़ा,
याद करो वो बीते दिन जब अपनी हड्डी तोड़ा,
बेतहाशा दौड़ लगाई, चाह में थी तुम समाई,
गड्ढे में जब पाँव पड़ा तो नानी-दादी याद आई,
तुम भी दादी-नानी बन गई और मैं दादा-नाना,
प्यार फिर भी बना रहा, अलग हो गया घराना,
हमारे प्यार की बातें सुन बच्चे मंद-मंद मुस्काते,
बीच में अपने प्यार के कुछ किस्से हमे सुनाते,
किस्से बनते-बनते रह गए ऐसे अपने किस्से,
कभी तेरे-मेरे बीच के थे, अब बच्चों के हैं हिस्से ।

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com

18 Comments

  1. mani mani 06/07/2016
  2. babucm babucm 06/07/2016
  3. sarvajit singh sarvajit singh 06/07/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/07/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/07/2016
  6. Ankita Anshu Ankita Anshu 06/07/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/07/2016
  8. शीतलेश थुल शीतलेश थुल 03/09/2016

Leave a Reply