रो रहा है झारखंड

रो रहे है पहाड़
रो रही है नदी
रो रहे है झारखंड के
जीवन्त झरने

अब झारखंड की
पहाड़ों पर पेड़ घना नहीं है
नदि-नालों मे पानी नहीं है
और जीवन्त झरना तो
किसी की बुरे नजर से
सुख गया है

जंगल अभी नहीं है
कंक्रीट के पेड़ से ही
वहां अब घना हो गया है
शेर -भालू, हाथी और सियारों के
घर अब टुट गया है
अब वहां माफियाआें के
गाड़ी-मोटर चलने की
शोर से
पूरा भर गया है.

रो रहे है अब
झारखंड के पहाड़-पर्वत
पेड़ -पौधा और जानवर

गाय-बैलों के जैसे
अब झारखंड की
लड़कियां खो रही है
बुरे लोगों का अब
झारखंड पर बुरा
नजर लगा हुआ है
इसलिए पहाड़ -पर्वत के साथ
झारखंड भी रो रहा है.

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