|| भगवद्गीता ज्ञानामृत ||

श्रीकृष्ण  27॥ दोहा ॥

जय योगेश्वर जय परमेश्वर, जय जग के तारनहार |
मुखारविंद से निःसृत वाणी, करती जगदोद्धार ||
वह वाणी पाकर जिसे, हुईं सरस्वती धन्य |
तुलना कर पाए कोई, ग्रन्थ न ऐसा अन्य ||

॥ छन्द॥

जय योगेश्वर, जय नंदलाला, जग को दी गीता न्यारी |
इक कालजयी वाणी, जिसे पाकर धन्य हुई सृष्टि सारी || १ ||
मोह पार्थ का हरने को, जग में गीता को प्रकट किया |
देकर ज्ञानामृत, विश्व को मोह भरम से मुक्त किया || २ ||
अज्ञान पृथान्न्दन का, गीता के पृकटीकरण का हेतु बना |
गीताज्ञान भवसागर नैय्या, पार लगाने का सेतु बना || ३ ||
विषाद योग ने जन्म लिया, सांख्य योग का विस्तार हुआ |
कर्म योग को मिली व्याख्या, ज्ञान योग साकार हुआ || ४ ||
ज्ञान योग की व्याख्या से, यज्ञ कर्म का मंत्र मिला |
सन्यास योग से अज्ञान नाश को, इक नूतन पन्थ मिला || ५ ||
ध्यान योग अभ्यास प्रेरणा का, इक नव स्त्रोत बना |
ज्ञान विज्ञान की हुई व्याख्या, समग्र बोध का योग बना || ६ ||
विभूति योग में अर्जुन को, स्व विभूतियों का ज्ञान दिया |
विश्वरूप का दर्शन देकर, पार्थ भक्ति को मान दिया || ७ ||
निर्गुण को व्याख्या देकर, भक्ति योग को प्रकट किया |
ज्ञान ब्रह्म को परिभाषित कर, क्षेत्र क्षेत्रज्ञ स्पष्ट किया || ८ ||
अक्षर ब्रह्म से ईश्वर चिन्तन, कर भय से मुक्त बनो |
राजविद्या को करो जाग्रत, मन से मेरे भक्त बनो || ९ ||
गुणातीत बनकर जग में, तीनो गुणों से उपर हो |
मै कहलाता हूँ पुरुषोत्तम, आकर मेरी शरण गहो || १० ||
आसुरी सम्पद को त्यागो, दैवी का विस्तार करो |
त्रिविध श्रद्धा विकसित कर, आप अपना उद्धार करो || ११ ||
उद्धार पथ पर आगे बढ़ कर, मोक्ष योग को प्राप्त करो |
मेरी भक्ति में खो जाओ, स्वयं को ना आप्त करो || १२ ||
हे पार्थ ! शोक किसलिए, जगत तो आती जाती माया है |
अज्ञान जनित यह मोह तुम्हारा, भ्रम से विकसित छाया है||१३ ||
नश्वर शरीर का मोह त्याग कर, अनासक्त हो कर्म करो |
वश में नही तुम्हारे जो, उस हेतु न त्याग निज धर्म करो|| १४ ||
काम कभी भी तृप्त न होगा, क्रोध को भड़कायेगा |
भोगों की आहुति पाकर और, प्रबल हो जाएगा || १५ ||
ज्ञान विज्ञान के शत्रु काम पर, विजय न जब तक तू पाएगा ।
काम क्रोध का शमन न होगा, अहंकार बढ़ जाएगा ॥ १६ ॥
हे मानव ! तुम कर सकते हो काम क्रोध का उन्मूलन |
वह शक्ति तुम्हारे अंतर में है, देती जो जीवन नूतन || १७ ||
यह सारा बृह्मांड, मुझमें ही तो समाया है ।
मेरी इच्छा से रचित विश्व, मेरे अंतर की छाया है ॥ १८ ॥
सूर्य चन्द्र, मेरे ही तेज से, जगमग जगमग करते हैं ।
ये सारे नक्षत्र निकर, मेरी ही उष्मा से तपते है ॥ १९ ॥
ये तैंतीस कोटि देवता, मेरे दर्शन के अभिलाषी हैं ।
मुझमें ही सब बसे हुए, मेरे अंतर के वासी हैं ॥ २० ॥
मैं ही पर्वतों में सुमेरू, मैं ही नदियों में गंगा हँ ।
शस्त्रधारियों में राम हूं मैं, तपस्वियों की मैं तपस्या हूँ ॥ २१ ॥
अर्थार्थियों का अर्थ हूँ मैं, आर्तो का पीड़ाहारक हूँ ।
जिज्ञासुओं की जिज्ञासा मैं, ज्ञानियों का ज्ञान कारक हूँ ॥ २२ ॥
मेरी ही गन्ध है पृथ्वी में, मेरा ही वर्ण है अम्बर में ।
इस चराचर का दृष्टव्य सकल, धारित है मेरे अंतर में॥ २३ ॥
प्रणवाक्षर मेरा ही स्वरूप, वेद मुझे ही गाते हैं ।
पुराण, उपनिषद, मुझसे हैं, सब मेरे ही गुण गाते हैं ॥ २४ ॥
उदभव, पालन, संहार, सभी मेरे ही कारण होते हैं ।
मेरी इच्छा से जग में, उत्पत्ति , प्रलय कारित होते हैं ॥ २५ ॥
मैं हूँ सब में तटस्थ, जग में मेरा प्रिय कोई नहीं ।
न ही अप्रिय मुझे कोई, मैं सबमें हूं, मुझमें कोई नहीं ॥ २६ ॥
मेरे प्रभाव को ऋषि महर्षिगण, भी जान न पाते हैं ।
उनका भी आदि कारण मै , मुझको ही भजते जाते हैं ॥ २७ ॥
मैं हूँ सबके हृदय का वासी, जान मुझे वह सकता है ।
तप के तेज की अग्नि में, जो तपा स्वयं को सकता है॥ २८॥
नियम काल का, तेरे टालने से नहीं टल पाएगा ।
युद्ध अवश्यम्भावी है, तू रोक इसे न पाएगा ॥ २९ ॥
तेरे युद्ध न करने से विपक्षी नहीं बच पाएंगे |
काल सभी को व्यापेगा भूशायी सब हो जायेंगे || ३० ||
लोकों का नाश करने को ही, मैं काल बनकर प्रकट हुआ |
मेरी इच्छा से ही जग, इस महायुद्ध में प्रवृत हुआ || ३१ ||
मेरी इच्छा का माध्यम बनकर, तू इन मरे हुओं का मारेगा ।
प्रेरक स्वयं करा लेगा, तू साक्षी बन रह जाएगा ॥ ३२ ॥
शोक न कर, इस धर्मयुद्ध मे निश्चित तेरी जय होगी ।
धर्म कभी न पराजित होगा, सत्य की ही विजय होगी ॥३३॥
मेरी भक्ति में आकर, नित मुझको ही नमन करो ।
मैं ही पार लगाने वाला, आकर मेरी भक्ति करो ॥ ३४ ॥
सारे धर्मों से श्रद्धा समेट कर , आकर मेरी शरण गहो ।
मैं ही उद्धारक हूँ तेरा, मेरी भक्ति में मगन रहो ॥ ३५ ॥
अर्थार्थी हों, या हों आर्त, या हों जिज्ञासु ज्ञानी |
ज्ञानगंगा में लगाकर गोते, करते निर्मल मन वाणी || ३६ ||
कर्म अकर्म की व्याख्या दी, जग को एक नूतन ज्ञान दिया |
गुणातीत के गुण बतलाकर, गीता दर्शन को मान दिया|| ३७||
तीनों गुणों से उपर उठकर, गुणातीत कहलाओगे।
कर्माकर्म से आगे जाकर, निष्कामी बन जाओगे ॥ ३८ ||
गुणकर्म की व्याख्या देकर, जग को नव आधार दिया |
हरि ॐ तत्सत् परिभाषित कर, भक्ति को विस्तार दिया || ३९ ||
हे योगेश्वर ! देन तुम्हारी अद्धितीय है इस जग में |
अतुलनीय है दान ज्ञान का, हरता संशय पग पग में || ४०||
|| दोहा ॥
क्या न दिया योगेश्वर ! तुमने करने को कल्याण |
ॐकार जाप का नाद बजे, जब तन से छूटे प्राण ||
किस विधि विनती करूँ तुम्हारी, हे जग के आधार |
कृपा तुम्हारी लेखनी मेरी, कर दो बेड़ा पार ||

|| ॐ ||

9 Comments

  1. babucm C.m.sharma(babbu) 05/07/2016
    • अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव aklesh1960 15/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 06/07/2016
    • अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव aklesh1960 15/07/2016
    • अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव aklesh1960 15/07/2016
  3. Sukhmangal Singh sukhmangl 07/07/2016
    • अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव aklesh1960 15/07/2016
  4. अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव 07/07/2016

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