आतंक का खेल

देखो चली है सज-धज के कायरों की टोली,
हाथ में हथियार उठाकर बोलें क्रूरता की बोली,
मनुष्य का धर्म मानवता जिसे समझते खोट,
धर्म की गलत व्याख्या करके लेते उसकी ओट,
दहशत का माहौल बनाते, है सत्ता की भूख,
दुनिया को डरा-धमका, दिखाते अपना रसूख,
वैसे तो यह पाला-पोषा महाशक्तियों का खेल,
लम्बी दूरी चलती गाड़ी तो कभी हो जाती डीरेल,
दहशतगर्दों को खड़ा कर खरीदते सस्ता तेल,
सस्ते तेल के बदले में महंगे हथियारों का सेल,
बिना किसी आतंक के हथियारों का क्या होगा,
कैसे परखा जायेगा हथियार, कैसे उन्नत होगा,
इनकी आजमाइश को चाहिए अनेकों दहशतगर्द,
गोलों की जब धधक उठेगी मिट जायेगी सर्द,
दुनिया किसके सञ्चालन में गुट निर्धारण होगा,
अचूक ब्रह्मास्त्रवाला ही दुनिया का लीडर होगा,
तेल से चलती विकास की गाड़ी, कहलाते हैं धनी,
तेल के कुओं पर कब्जे को ले अक्सर गुटों में ठनी,
दुनिया के सत्ता की चाभी ले रचते मुद्रा का खेल,
साथ निभानेवाले से मेल, बाकी हो जाते बेमेल,
विकसित सभ्यता की कुर्सी पर हैं इनके तुच्छ विचार,
पैदा करते फिर मिटाते आतंक, मानवता होती शिकार,
जबतक आतंक की लपटें उनके कदमों तक न जाए,
आँख खोलकर सोते रहते उनको होश न आये ।

विजय कुमार सिंह
vijaykumarsinghblog.wordpress.com

18 Comments

  1. tamanna tamanna 05/07/2016
  2. babucm babucm 05/07/2016
  3. mani mani 05/07/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/07/2016
  5. sarvajit singh sarvajit singh 05/07/2016
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/07/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/07/2016
      • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 26/07/2016

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