कविता- जिंदगी

कविता- जिंदगी

हर रोज़ बहाने ढूँढ़ती क़ज़ा |
माँगे ज़ीस्त से मिलन की रज़ा ||

वक्त के प्यार में डूबी ज़ीस्त |
सुने नहीं है क़ज़ा की सदा ||

आज अनजान बनी है जिंदगी |
कभी वक्त भी कमायेगा दग़ा ||

इतराये कैसे ज़ीस्त ख़ुद पर |
देखो जरा वक्त साथ क्या चला ||

दिल भरा जब वक्त का ज़ीस्त से |
छीना कुदरत से जो उसे मिला ||

कुदरत, वक्त हॅसे मिलकर देखो |
पूछती रह गयी जिंदगी ख़ता ||

ख़ाक से राख़ हुई जिंदगी को |
संभाले हुऐ चले “मनी” क़ज़ा ||

मनिंदर सिंह “मनी”

14 Comments

  1. आदित्‍य 01/07/2016
    • mani mani 02/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/07/2016
    • mani mani 02/07/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/07/2016
    • mani mani 02/07/2016
  4. C.M. Sharma C.m.sharma(babbu) 01/07/2016
    • mani mani 02/07/2016
  5. sarvajit singh sarvajit singh 01/07/2016
  6. mani mani 02/07/2016
  7. Amar Chandratrai Amar Chandratrai 02/07/2016
  8. mani mani 02/07/2016
  9. mani mani 02/07/2016

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