मन की गहराई

मन अशांत
अशांत मन में
प्रसांतमहासागर।
शांत मन में समुद्र का जमावड़ा
सात समंदर
एक विशालतम भुगोल के परिदृश्य
जल का महाप्रलयंकारी स्वरूप।
मन की परिभाषा
उसके परिच्छेद
उसके बहुत तेज गति
इसके मति से मिलते जुलते समंदर।
मन की गहराईयाॅ
क्या कम है समंदर से
कल्पनाये भी ऐसी
पलक झपकते लोक परलोक
सबकी खबर।
जिसने देखा तक नहीं
सब कुछ हाजिर है
बिलकुल सामने नजर के
जादुई ताकत की तरह
हजारों जन्मों के ख्याल
भरे पड़े है मन के दिमाग में।
बनाई है जिसने धरती.आकाश
जल.अग्नि और वहती हुई हवा
एक परिधिनुमा ब्राहाण्ड।
उसके गोद में घूमते
सूर्य.तारे.चादॅ जैसे कई और
आदि से अंत
सब जुडें है चैन की तरह
न टूटने वाला रात और दिन
कभी खत्म न होने वाला
एक शिलशिला।
एक कडवा अनूठा सच
आत्मा
ईश्वर और उसके पाॅच तत्व
सभी अमर है।
समंदर की तरह
उसके कुण्डली में अमृत
उसके गहराईयों में फैला विष
रत्नों के भंडार से भरा गोद
संसार में सब कुछ है।
लुभाने और पाने के लिए
जी भरकर खाने के लिए
देखने और दिखाने के लिए।
हमारा कुछ नहीं
कुछ भी नहीं
कर्म करो
अपने कर्मो से प्रधान बनो
सत्यमेव जयते ।।
बी पी शर्मा बिन्दु
Writer Bindeshwar Prasad Sharma (Bindu)
D/O Birth 10.10.1963
Shivpuri jamuni chack Barh RS Patna (Bihar)
Pin Code 803214

6 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 01/07/2016
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 01/07/2016
  2. Amar Chandratrai Amar Chandratrai 01/07/2016
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 01/07/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/07/2016
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 01/07/2016

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