असमान आर्थिक वितरण..गरीबी..विडम्बना..(कविता)

खा खा के मर गए कुछ..खाने को मर रहे हैं..
कुछ मर रहे हैं क्यूंकि खाने को कुछ नहीं है..
इस जिन्दगी में जीने को है कई बहाने..
माना मगर यहाँ पर जीने को कुछ नहीं है..

मुस्कान जहाँ पे बसती है आँसुओं के घर में..
दुनिया में और ऐसा कोई वतन नहीं है..
मुर्दों को ओढ़ने को है कब्र की दीवारें..
जिन्दों को ओढ़ने को थोड़ा कफ़न नहीं है..

-सोनित

7 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/06/2016
  2. Amar Chandratrai Amar chandratrai Pandey 30/06/2016
  3. mani mani 30/06/2016
  4. C.M. Sharma babucm 30/06/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/06/2016
  6. सोनित 30/06/2016

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