सबरनाखा……… चंद्र मोहन किस्कु

मैं सबरनाखा
सोना माई
बहते चल रहा हूँ
सोहराय,करम, माघे की
नृत्य और गीत के ताल में
रसीली हाँड़िया और
महुआ शराब की नशे मे
हर्ष -आनन्द के साथ
नाचते -गाते जा रहा हूँ –

अब मेरी
नाच की ताल में और
सुरीली सुर पर
काला जादू लग गया है
दुश्मनों का बुरा नजर लग गया है
डायन -नाजोमों के
बुरा नजर से भी
भयानक

अब मेरा
सहर्ष नाच कहाँ है
कल -कल की गीत बोल भी
अवरूद्ध हो गया है
मेरी चलने की पथ पर
बड़े -बड़े डेम
बन गये है
शहर -नगर और
कल -करखाने की गंदगी
मेरी सोने जैसी देह पर
लिपते है

अब मेरी देह पर
झलकनेवाली सोना नहीं है
कूड़ा -कचरा और गंदगी से
कोयला जैसा काला हुआ है
अब मैं
बहता नहीं हूँ
अपने से ही दुर
बहुत दुर
चला जा रहा हूँ

4 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 30/06/2016
  2. Amar Chandratrai Amar chandratrai Pandey 30/06/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/06/2016

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