माॅ की ममता

माॅ की ममता

जिसने मुझको जनम दिया उस माॅ को मैं भुलूॅ कैसे
अपने कर्म का फल है भाई अपने कर्म को भुलूॅ कैसे ।।

माॅ की आॅचल के नीचे हम कितना सकुन पा लेते हैं
ममता की देवी अपनी है माता उनके चरण छु लेते हैं ।
माॅ के दिल में दर्द है होता जब बच्चे को कुछ होता है
बच्चा भी है रहता पूत जब तक जब वो सपूत होता है ।
सागर से क्या कम है माता उस माॅ को मैं भुलूॅ कैसे
भुखे रहकर मुझे खिलाई उस माता को मैं भुलूॅ कैसे ।।

नौ माह तक गर्भ में जिसने कितनी पिड़ायें दर्द सहे
जन्म हुआ तब लाल देखकर हाय रामा उफ् भी न करे ।
वह टुकड़ा कलेजे का जब आॅख के आगे आ ही गया
इससे बढ़कर क्या होगा जीने का सहारा मिल ही गया ।
जिसने हूनर दी है मुझको उस माॅ को मैं भुलूॅ कैसे
राह दिखाई बचपन सींचा उस माता को भुलूॅ कैसे ।।

जो माॅगा सब उसने दिया है पूरा तो उसने ही किया है
सबकुछ अपना देकर उसने नाम अपने कुछ न किया है ।
एक तड़प माॅ मन मे रखती दूर न जाए बस नजरों से
थोड़ी सी जो चोट लगे तो टीस सी उठती अधरों में ।
जिसने चलना मुझे सिखाया उस माॅ को मैं भुलूॅ कैसे
जिसने हॅसना मुझे सिखाया सचमुच उनको भुलूॅ कैसे ।।

बी पी षर्मा बिन्दु

8 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 29/06/2016
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 29/06/2016
  2. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 29/06/2016
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 29/06/2016
  3. Amar Chandratrai Amar Chandratrai 29/06/2016
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 29/06/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/06/2016
    • Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 29/06/2016

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