हुज़ूर धीरे धीरे….”अमर चंद्रात्रै पान्डेय”

जब ऱूख से हटा रही थी वो नकाब धीरे धीरे,
बादलों से जैसे निकल रहा था आफताब धीरे धीरे,
जान ले रही थी ” अमर ” उनकी वो शोख अदाएँ ,
दिल से बस इतना ही निकला,
जान लिजिए मगर हुज़ूर धीरे धीरे जनाब धीरे धीरे ।

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/06/2016
  2. babucm babucm 29/06/2016
  3. Amar Chandratrai Amar Chandratrai 29/06/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/06/2016
  5. sarvajit singh sarvajit singh 29/06/2016

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