“जिन्दगी-एक:कर्म-पथ”

चल पड़ी जिस तरफ जिन्दगी मन्थर-मन्थर धूमिल पथ पर,
कुछ फिसलती कुछ सम्भलती मुट्ठी से जैसे रेत निकलती !

सूर्य धुँधला सा,
छिपा जा रहा बादलों में,
सिमटती जा रही है, रोशनी आसमाँ में,
पग-पग बढ़ रहा पथिक पथ-पर
सोंचता,कैसी है, ये जिन्दगी कश्मकश में ।

सम्भल के चलना इन राहों में,
लग जायें न काँटे कहीं पाँव में,
घाव हो जिस्म में,माथे पे सिकन,
न जाना ऐसी फिजाओं में ।

गरज रहे बादल,इन काली घटाओं में,
सिहर उठता बदन,इन ठण्डी हवाओं में,
घिर रहे बादल,घन की ओर से,
कैसे पहुँचेंगे परिन्दे,आशियानों में ।

हे !’मनुज’ तू बिघ्न की परवाह न कर,
हो, अडिग सामना कर,
करेगी आत्मसमर्पण प्रकृति भी,
सुष्मित होकर !
तेरी दुर्लभ मेहनत पर ।

आनन्दित होगा हृदय,
जब पूर्ण होगी अभिलाषा,
जिस पर चलेगा’जीवन-रथ’
वो है,-“जिन्दगी-एक:कर्म-पथ”।।
-आनन्द कुमार

6 Comments

  1. babucm babucm 28/06/2016
  2. Amar Chandratrai Amar Chandratrai 28/06/2016
  3. mani mani 28/06/2016
  4. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 29/06/2016
    • आनन्द कुमार ANAND KUMAR 29/06/2016
  5. आनन्द कुमार ANAND KUMAR 29/06/2016

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