“अपनो से दुर”….अमर चन्द्रात्रे पान्डेय…..

अपनों से बहुत दूर अपना आशियाना बन गया,
हाय यह कैसा जिंदगी का फसाना बन गया,
जिस गांव की मिट्टी से था हमारा दिल का रिश्ता,
उसकी यादों का दिल में एक अलग अफसाना बन गया !
याद आते हैं हर पल गांव के लोग और घर परिवार,
कितना अनोखा है वह उनका प्यार,
वह मां की ममता और पापा का दुलार,
वह भाई के साथ की छोटी मोटी तकरार !
वह सावन के झूले और होली के रंग,
वह दिवाली और छठ की अनोखी सी उमंग,
वह दोस्तों के साथ की गुस्से में मारामारी,
फिर भी उनसे मिलने की वह दिल में बेकरारी,
वह भी क्या दिन थे अजीब क्या अजीब अजीब थी हमारी यारी,
वह दोस्तों के साथ गिल्ली डंडा और क्रिकेट,
वह स्कूल बंक करके दोस्त के घर पर शक्तिमान और सोनपरी देखने वाला सीक्रेट,
काश हम फिर से बच्चा हो जाये ,
काश वो दिन आ जाये तो कितना अच्छा हो जाये,
हाय यह मजबूरी जो पैसा कमाने के चक्कर में हो गए हम अपनों से इतना दूर,
लेकिन यह वादा है ऐ गांव हमारे एक दिन “अमर तुम्हारे पास लौटेंगे हमेशा के लिए जरूर।

6 Comments

  1. sarvajit singh sarvajit singh 28/06/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 28/06/2016
  3. babucm babucm 28/06/2016
  4. mani mani 28/06/2016
  5. Amar Chandratrai Amar Chandratrai 28/06/2016

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