एक रात के लिए…………मनिंदर सिंह “मनी”

भूख से तड़प रहा नव-जन्मा मेरा बच्चा,
कहाँ से लाउ दूध, उसकी भूख मिटाने के लिए,
दो दिन से भूखी खुद मैँ, स्तनों में दूध कहाँ से लाती ?,
चल दी मैँ रात के अंधेरो में, दो घुट दूध लाने के लिए,
गरीबी की मार ना सह सका बाप इसका,
लगा लिया खुद को फंदा, मुझे तो जीना था अपने लाल के लिए,
हाथ फैलाए कितनो के आगे, कितनो से की मिन्नतें,
चल आगे कहकर, देख रहे थे हवस का शिकार बनाने के लिए,
लगा दी बोली किसी ने, सुन मेरे बच्चे की चीखे,
दूंगा वही जो तू मांगेगी, बस जिस्म चाहिए तेरा एक रात के लिए,
अस्मत बचा लु, या भूख से मरते अपने लाल को,
समझ नहीं आया क्या कहु उस अजनबी को इस बात के लिए ?,
एकदम सुन्न सा पड़ गया शरीर मेरा, निढाल हो गिर पड़ी मैँ,
और चुप हो गया लाल मेरा, जैसे दे गया जवाब मेरे सवाल के लिए,
गरीब की अस्मत कितनी सस्ती ? और भूख कितनी महंगी ?
छोड़ गए हम दोनों सवाल, इंसानियत का ढोल पीटने वालो के लिए,

18 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 27/06/2016
    • mani mani 28/06/2016
  2. आनन्द कुमार ANAND KUMAR 27/06/2016
    • mani mani 28/06/2016
  3. Amar Chandratrai Amar Chandratrai 27/06/2016
    • mani mani 28/06/2016
    • mani mani 28/06/2016
  4. sarvajit singh sarvajit singh 28/06/2016
    • mani mani 28/06/2016
    • mani mani 28/06/2016
  5. babucm babucm 28/06/2016
    • mani mani 28/06/2016
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/06/2016
    • mani mani 28/06/2016
  7. Rajeev Gupta Rajeev Gupta 28/06/2016
    • mani mani 28/06/2016

Leave a Reply