” एक मानव ऐसा भी( किन्नर ) ” द्वारा गायत्री द्विवेदी

जन्म पर मेरे क्यों दीप नहीं जलाती मां
हर बच्चे के मां जैसे तू मुझे क्यों नहीं अपनाती मां

पशु भी अपना हर बच्चा अपनाता है मां
तो तू क्यों मुझे अंजान गली छोड़ जाती है मां

हर बच्चे के दुःख में रोती है उसकी मां
जब दर्द हो उसे तो उसकी दवा होती है मां

तू क्यों मुझे दुःख में छोड़ जाती है मां
क्यों इस दुनिया से इतना दर्द दिलाती है मां

कर यकीन मैं भी तेरी ही जीस्म का टुकड़ा हूँ
देख ध्यान से पिता सा लिए मैं भी मुखड़ा हूँ

मेरे किसी अपने की जुबा पर मेरी बात नहीं होती
एक तेरे छोड़ देने से दुनिया में कोई औकात नहीं होती

दूसरों के लिए हँसाना दूसरों के लिए गाना
दूसरों की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी मनाना

न कोई घर मेरा न कोई अपना मेरा
न कोई धर्म मेरा न कोई सपना मेरा

न डर इस बात का की अपने रुठ जाएंगे
न डर इस बात का की मेरे सपने टूट जाएंगे

न पुरुष सा कठोर न नारी सी कोमलता
न मेरी जायज लगती किसी को कामुकता

अपाहिज कमजोरी से तो नारी सुरक्षा को परेशान
लावारिश अपनों की खोज में तो पुरुष दक्षता को परेशान

मेरे पास ऐसी सारी परेशानी है
मेरी ज़िंदगी बस दर्द की कहानी है

मैं दूसरों की ख़ुशी में गाउँ तो बदनाम
क्या मैं इस लायक नहीं की कर पाऊं कोई काम

बुरे वक्त की खासियत की वो भी गुजर जाता है
पर नसीब मेरा की वक्त मुझसे जुड़ते ही बुरा हो जाता है

आज एक गुजारिश है मुझे मेरी पहचान दे दो
मानवता के नाम ही सही मुझे भी मानव नाम दे दो

18 Comments

    • Gayatri Dwivedi 25/06/2016
  1. mani mani 25/06/2016
    • Gayatri Dwivedi 25/06/2016
    • Gayatri Dwivedi 25/06/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/06/2016
    • Gayatri Dwivedi 25/06/2016
  3. अकिंत कुमार तिवारी 25/06/2016
    • Gayatri Dwivedi 25/06/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 25/06/2016
  5. Gayatri Dwivedi 25/06/2016
  6. babucm C.m.sharma(babbu) 26/06/2016
  7. Gayatri Dwivedi 26/06/2016
  8. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 26/06/2016
  9. Gayatri Dwivedi 26/06/2016
  10. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 26/06/2016
  11. मनीष मालवीय 04/07/2016

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