Rasta

एक सफर हूँ मैं;
एक रास्ता हूँ;
हर इंसान जिस पैर चलता है;

कभी गिरता है;
तो रोत्ता है;
तो कभी हस्ते हस्ते सम्भलता है;

कोई करता है खतायें;
तो कभी;
नसीब को अपने कोसता है;
मुकद्दर है ख़राब उसका;
हर वक़्त युहीं सोच्त्र है;

एक और वहीँ;
एक इंसान मुझे;
शुक्रिया रोज करता है;
मानता है अपना खुद मुझे;
विश्वास मुझपे करता है;

कहता है मैं वक़्त हूँ उसका;
हर अच्छ बुरा हालात हूँ;
सिखाता हूँ हर बात उसको;
हर पल मैं उसके साथ हूँ;

तो क्यों हूँ मैं काल किसी का;
क्यों किसी की पहचान हूँ;
क्यों हूँ मैं कभी दरिया दिल;
तो कभी किसी पैर एहसान हूँ ???;

कोई नहीं मैं अपना किसी का;
ना किसीका मेहमान हूँ;
जैसा तुम सोचोगे मुझको;
वैसा ही मैं स्थान हूँ;

कहो तो मैं महाभारत ;
तो कभी ;
रामायण का मैं सार हूँ ;
कभी किसी की जीत हूँ मैं ;
तो कभी किसी की हार हूँ ;

अचे बुरे हर इंसान को ;
एक बराबर तारा है ;
सबको दिया मौका मैंने ;
सबका जीवन संवारा है ;

ना कोसो मुझे ;
बुरा कह कर ;
अपने कर्मो को सवारों जरा ;
मैं दिखाऊंगा उम्मीद तुमको ;
विश्वास तो दिल में उतारो जरा ;

कोई कहते मुककदर मुझे ;
तो कोई कहते जहां ;
ना है कोई शुरुआत मेरी ;
ना कोई अंतिम पहचान ;

चलता हूँ मैं बिना रुके ;
ना होती मुझको थकान;
ना वक़्त मुझको रोक सके ;
ना हालात के उठान ;

कहीं किसी का सफर हूँ मैं ;
तो कहीं किसी की मंज़िल हूँ ;
उतार चढ़ाव और सन्तुलन में ;
हर विकास में मैं शामिल हूँ …………

2 Comments

  1. babucm babucm 24/06/2016

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