Dil ne kaha

दिल ने कहा , कौन हूँ मैं ;
मुझे किसने बनाया है ;
कोनसा है सागर या दरिया ;
बस प्यार जिसमे समय है ;
क्या आया ख्वाब ;
मुझे रिश्तों से बांध दिया ;
कभी भाई कभी बहन ;
कभी माँ बाप का मुझको नाम दिया ;
कभी बसा दिया सारा घर ;
खुशियों के गाओं में ;
कभी छोड़ दिया वीरान शहर की ;
यादों की छाओं में ;
कभी फ़िज़ा आई , कभी तूफ़ान आया ;
महक संग बहआरों का , पैगाम आया ;
कहने को सब साथ आये ;
बस फिर भी मैं वीरान आया ;
उम्मीद जगी रौशनी की मगर ;
अँधेरा बहुत ज्यादा था ;
सुख की बात तो दूर थी यारों ;
अभी दुःख भी मेरा आदा था ;
चलता रहा मैं अपनी ;
मंज़िल की तलाश में ;
बरसो बीत गए मेरे ;
एहसास की प्यास में ;
मुक़दर तो ख़राब था मगर हिमायत अभी बाकि थी ;
दूसरों पैर दया की आदत मेरे लिए साथी थी ;
उठाता रहा लोगों का दुःख ;
सुख उनको देता था मैं ;
मुस्कान होती थी चेहरों पे सबके ;
हस्ते हुए में भी रोटा था मैं ;
फिर सुना मैंने , कोई खुदा सबका मालिक है ;
तो कोई बोल ये मंदिर नहीं ख्वाजा की ही मस्जिद है ;
खोजता रहा मैं आपको अपने ;
दुनिया के बाज़ार में ;
लेकिन फसा नहीं कभी भी मैं ;
झूट की मझधार में ;
कितनो का घर उजड़ते देखा ;
कितनो का तो था भी नहीं ;
कुछ भी कहो सबमे हूँ मैं ;
बस फिर भी मेरा कोई नहीं ;
एक मोड़ आया उलझनों का ;
जहाँ पैर मैं नीलाम हुआ ;
बिक गयी इंसानियत मेरी ;
फरेब मेरा नाम हुआ ;
वहीँ दूसरी और मोड़ के ;
मुझको सच्चा इंसान मिला ;
वहीँ मुझको खुदा का घर ;
जन्नत जैसा स्थान मिला ;
पुछा उस से तू क्यों है सच्चा ;
सबसे अलग एक तू है सच्चा ;
क्यों नहीं तू दुनिया के जैसा ;
क्या ख़ास है बस तुझमे ऐसा ;
उसने कहा मैं ख़ास नहीं ;
खास तो बस तुम ही हो ;
प्यार , सच्चाई , ईमानदारी
इनसब का ख़िताब बस तुम ही हो ;
मैं भर गया आपसे अपने ;
क्या ऐसा मैंने सुन लिआ ;
लगा बस पल में मैंने ;
सपनो का घर चुन लिआ ;
खोगया इसकदर मैं जैसे ;
सपनो में कहीं खोया हूँ ;
नींद खुली तो पता चला ;
हाँ मैं वाकई अबतक सोया हूँ ;
वो सपना था पैर फिर भी मगर ;
एक सच्चाई का एहसास था ;
वीरानी में भी मेरी यहाँ ;
सब कुछ मेरे पास था ;
फिर समझ आया राज़ इसका ;
की मैं खुदमे एक महान हूँ ;
प्यार बरसता है जहाँ से ;
वो शांत मैं नीला आस्मां हूँ ;
मुझे बनाया बस खुदको मैंने है ;
भावनाओं की ासमझस जिसके रंग सुनहरे हैं ;
कभी झूठा तो कभी सच्चा ;
सुख दुःख के यहाँ सागर गहरे हैं ……

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