कन्यादान

जाओ मैं नही मानती, कयोकि मेरी बेटी कोई वस्तु नही जो कर दूँ मैं दान,
मेरी बेटी मेरे अस्तित्व का अंश एक जीती जागती धड़कती रचना उसे पृभु की,
ममता, प्यार, करूणा, दया का हिलोरे लेता सागर कैसे मैं कर दूँ दान? कन्यादान
ये शब्द कब बना? किसने और कब गढ़ा ?
क्या गढ़ने वाला हृदयहीन था ?
या विचार करने की आवश्यकता ही न थी,
सदियों से चले आ रहे इस अनर्गल र्पलाप और व्यवहार, व्यापार ने मुझे झकझोरा कई बार,
अपितु बार बार
नहीं!  अब और नहीं, नहीं होगा अब कोई कन्यादान
होगा तो गठबंधन दो आत्माओं का मिलन
जन्म जन्मानतरों के र्पेमियों का पाणिर्गहण
शुभ विवाह
मेरी नन्ही परी,  मेरी गुड़िया
मेरे हृदय का सपंदन, मेरे खुशियों की दुनिया
मेरा गर्व
मैं देती हूँ तुझे आज एक वचन, लेती हूँ संकल्प
होगा तेरा गठबंधन तेरे प्यार से, तेरे सपनों के राजकुमार से, होगा पाणिगृहण
अब नहीं होगा कोई दान, कन्यादान!

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Smt Manju srivastava

12 Comments

  1. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
    • Manju srivastava 23/06/2016
  2. C.M. Sharma babucm 23/06/2016
    • Manju srivastava 23/06/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/06/2016
    • Manju srivastava 23/06/2016
  4. Anchal Srivastava 23/06/2016
  5. mani mani 23/06/2016
  6. Manju srivastava 24/06/2016
  7. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/06/2016

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