गज़ल (समय ये आ गया कैसा )

गज़ल (समय ये आ गया कैसा )

दीवारें ही दीवारें , नहीं दीखते अब घर यारों
बड़े शहरों के हालात कैसे आज बदले हैं

उलझन आज दिल में है कैसी आज मुश्किल है
समय बदला, जगह बदली क्यों रिश्तें आज बदले हैं

जिसे देखो बही क्यों आज मायूसी में रहता है
दुश्मन दोस्त रंग अपना, समय पर आज बदले हैं

जीवन के सफ़र में जो पाया है सहेजा है
खोया है उसी की चाह में ,ये दिल क्यों मचले है

मिलता अब समय ना है , समय ये आ गया कैसा
रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं

ग़ज़ल प्रस्तुति:
मदन मोहन सक्सेना

6 Comments

  1. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 23/06/2016
  2. mani mani 23/06/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/06/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/06/2016

Leave a Reply