नेह गगरिया अम्बर ने व्याकुल भू पर बरसायी है

नेह गगरिया अम्बर ने व्याकुल भू पर बरसायी है
सब चहक उठे पादप पंछी गुलशन बगिया हरषायी है

व्याकुल मोर पपीहा थे, कोयल भी गाना भूली थी
भूला था मोर रासलीला चहुंओर हवाएं धूली थीं
पत्ते पेड़ों के सूखे थे शाखाएँ सारी सूखी थीं
नाले, तडाग और सरिता भी जैसे पानी को भूखी थी
कृत्यों ने आँखे सावन के दर्शन को भी तरसायी हैं
नेह गगरिया ———————

है मौन धरा मन में हर्षित थोड़ा सुकून अब पाया है
अम्बर से है नाराज़ मगर क्यों इतने दिन तड़पाया है
कह रही दोष नादानों का क्यों हमको सजा मिली इतनी
तुमने क्यों आँख तरेरी हैं हमने गल माफ करी कितनी
अब ममता बोल उठी माँ की करनी सुत की बिसरायी हैं
नेह गगरिया ———————–

बोला अम्बर ये पूत नहीं सबके सब आज कपूत हुए
लगता इनके दुष्कृत्यों से जैसे ये जिंदा भूत हुए
हैं स्वार्थवान सबके सब ही इंसान नहीं हैवान लगें
ये धूर्त हवस के भूखे हैं नादान नहीं शैतान लगें
जब देखे तेरे ज़ख्म प्रिये आँखें मेरी भर आयीं हैं
नेह गगरिया ————————-

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
9675426080