आँखें बोलना चाहती हैं – सर्वजीत सिंह

एक और पुरानी रचना ………….. नए दोस्तों के लिए

आँखें बोलना चाहती हैं

उसकी आँखें देखी तो लगा कुछ बोलना चाहती हैं
इंतज़ार में कटे जो दिन राज़ खोलना चाहती हैं
उसकी आँखें देखी तो लगा कुछ बोलना चाहती हैं

बस कट ही गए काटे नहीं जाते थे वो दिन और रात
रह रह के याद आती थी उसकी प्यार भरी हर बात
ग़म की उन यादों से प्यार के पल टटोलना चाहती हैं
उसकी आँखें देखी तो लगा कुछ बोलना चाहती हैं

सामने आते ही छंट गया लम्बे इंतज़ार का अँधेरा
नज़रों से नज़र मिलते ही चमक उठा आफ़ताब सा चेहरा
चेहरे की उस रंगत में मोहब्बत की लाली घोलना चाहती हैं
उसकी आँखें देखी तो लगा कुछ बोलना चाहती हैं

दूरियां खत्म करके आज पास आने की घड़ी है
फिर भी शर्मों ह्या की इक दीवार सी खड़ी है
उन सब दीवारों को तोड़ कर मस्ती में ढोलना चाहती हैं
उसकी आँखें देखी तो लगा कुछ बोलना चाहती हैं

लेखकः – सर्वजीत सिंह
sarvajitg@gmail.com

18 Comments

  1. mani mani 22/06/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 22/06/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/06/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 22/06/2016
  3. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 22/06/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 22/06/2016
  4. babucm babucm 23/06/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 27/06/2016
  5. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 23/06/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 27/06/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 24/06/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/06/2016
  7. sarvajit singh sarvajit singh 24/06/2016
  8. Amar Chandratrai Amar chandratrai Pandey 27/06/2016
  9. sarvajit singh sarvajit singh 27/06/2016

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