घराना ढूंढते है

कर सके गुफ्तगू हाल-ऐ-दिल
ऐसा हमसफ़र याराना ढूंढते है !!

सिर्फ बातो तक न हो जमीमा का
ऐसी मुलाकातो का बहाना ढूंढते है !!

जहॉं मे देखे लोग दिल के बड़े मुफलिस
मिले जाये रसिक महफ़िल,ज़माना ढूंढते है !!

वीरानगी सी छाई है इस तंग शहर में
करदे रौनक ऐ दिल वो तराना ढूंढते है !!

बहुत जी लिये “धर्म” गम की पनाहो में
खिले फिरदौस-ऐ-गुल वो घराना ढूंढते है !!

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डी. के. निवातियाँ _________

जमीमा का = सीमित
मुफलिस = दिवालियापन
फिरदौस = उपवन, स्वर्ग

18 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 29/06/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/06/2016
  2. mani mani 29/06/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/06/2016
  3. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 29/06/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/06/2016
  4. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 29/06/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/06/2016
  5. Amar Chandratrai Amar Chandratrai 29/06/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/06/2016
  6. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/06/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/06/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/06/2016
  7. sarvajit singh sarvajit singh 29/06/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/06/2016
  8. C.M. Sharma babucm 30/06/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/06/2016

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