आलस्य दूर भेज दो

ट्रिन-ट्रिन, ट्रिन-ट्रिन, ट्रिन-ट्रिन, ट्रिन-ट्रिन,
घंटी बज रही फ़ोन की, एक बार तो गिन ।
कितने प्रयास करने पर तुमने उठाया फ़ोन,
अब पूछ रही हो बार-बार बोल रहा है कौन ?
देखो सारी दुनिया है योग करने में लीन,
तुम पड़ी हो बिस्तर पर, ले रही गहरी नींद ।
सिलवटें सहेज दो, आलस्य दूर भेज दो,
योग की आवश्यक बातें मन में समेट लो ।
मैं शीर्षासन पर पहुंचा तुम प्राणायाम कर लो,
नव प्रभात नव रश्मि को आँचल में भर लो ।
स्वास्थ्य रहेगा अच्छा तो दुनिया भी भाएगी,
मन की कोयलिया भी मधुर-मधुर गाएगी ।
नव ऊर्जा संचित कर फिर बात मुझसे करना,
बोल रहा है कौन इस उत्तर को भी भरना ।
हम अपनी संस्कृति में नव रस भर पाएंगे,
जैसे तुम्हे समझाया, दुनिया को समझाएंगे ।

https://vijaykumarsinghblog.wordpress.com
विजय कुमार सिंह

20 Comments

  1. योगेश कुमार 'पवित्रम' 22/06/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 22/06/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/06/2016
  4. babucm babucm 22/06/2016
  5. ALKA प्रियंका 'अलका' 22/06/2016
  6. sarvajit singh sarvajit singh 22/06/2016
  7. Inder Bhole Nath Inder Bhole Nath 22/06/2016
  8. mani mani 22/06/2016
  9. अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 22/06/2016

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