अधूरी मोहब्बत

तुमने मुड़कर न देखा हभ आगे बढ़ गए
आंसुओं के मोती आँखों में समेटे
मन चाहा रोक लूँ तुम्हे पर हिम्म्त न हुई
पता ही नही चला कब बात इतनी बढ़ गयी
रोका क्यूँ न मुझे शब्दों के बाण छोड़ने से
जो तुम्हारे दिल को छन्नी करती हुई मुझतक पहुँच गयी
टूटा दिल
दर्द दौड़ गया नस नस तक
रोया होगा खुदा भी
आवाज पहुंची होगी फलक तक
क्या हभेशा से ऐसी ही थी
हमारी अधूरी मोहब्बत………..

7 Comments

  1. shrija kumari shrija kumari 21/06/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/06/2016
  3. sarvajit singh sarvajit singh 21/06/2016
  4. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 22/06/2016
  5. babucm babucm 22/06/2016
  6. shrija kumari shrija kumari 22/06/2016

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