राजस्थान का थार

राजस्थान का थार

टिब्बों की ढलानों पर
उड़ते हुए रेत के कण
मरीचिका सी बनाते हुए
भटकाते प्यासे मन को
पानी तलाश में ईधर-ऊधर
तपती गर्मी उड़ती रेत
सूखा देती है गीले कंठ क ो
ज्यों फि रूं जैसे मैं पागल
बाहरी तन को झुलसाते हुए
हुई बावरी पे्रमी के बिछोह में
ऐसे प्यास भागती ईधर-ऊधर
यहां मिलेगा वहां मिलेगा
जागती है रात-रात भर
तन को झुलसाती
मन को झुलसाती
सांसों के जरिए हृदय को जलाती
पसीना तन से खुब छुटाती
हंसाती है तो कभी रूलाती
राजस्थान के थार की गर्मी
पहाड़ों से टकराकर
फि र से गर्म होकर आती पवनें
तन झुलसाती खुब सताती थार की गर्मी ।

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