शव

एक ओर दीपक जले , एक ओर आग
पल भर में जल कर शरीर , बन जाता है राख .
एक ओर सब रो रहे , एक ओर मुस्काय
बरसों का रिश्ता पल में ,छिन्न – भिन्न होइ जाय .
एक ओर सब दुःख में कुछ ना रहे हैं खाय
कैसा जीवन और ये बदन हैं , जो माटी में मिल जाय .
एक ओर सब देख रहे , एक ओर बतलाय
हस्ता – खेलता शरीर ,कैसे शव बन जाय .

कवियत्री – ऋचा यादव

9 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 21/06/2016
    • Richa Yadav Richa Yadav 02/07/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/06/2016
    • Richa Yadav Richa Yadav 02/07/2016
  3. अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 21/06/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/06/2016
    • Richa Yadav Richa Yadav 02/07/2016

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