भ्रम

ये कैसा तेरा प्रेम था छलिये!
जो सूर्य की तपती किरणों के पड़ते
ओस की भाँति उड़ गया ।
अब कहाँ प्रेम ,
और कहाँ समर्पण,
दूर-दूर तक तेरा बुना
मिथ्या का जाला रह गया।।

तेरे बुने जाले में फंस कर,
मैं तो अटकी रह गई ।
तू तो आया गया
स्वप्न की भाँति,
पर मैं तो
तेरे-मेरे भ्रम को
जीती रह गई ।।

अलका

18 Comments

    • ALKA प्रियंका 'अलका' 21/06/2016
  1. C.M. Sharma babucm 21/06/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 21/06/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/06/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 21/06/2016
  3. mani mani 21/06/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 21/06/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 21/06/2016
  4. Jay Kumar 21/06/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 21/06/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/06/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 21/06/2016
  6. Kajalsoni 21/06/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 21/06/2016
  7. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 21/06/2016
  8. ALKA प्रियंका 'अलका' 22/06/2016

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