तुम क्यों कभी नहीं मुसुकाते?_अरुण कुमार तिवारी

‘तुम क्यों कभी नहीं मुसुकाते?’
_अरुण कुमार तिवारी

महक उठे जब बूटा बूटा,
गुलदाऊदी सजे नभ् धरती|
नदियाँ नवसुर नवलय लेकर,
गीत नए बुन कल कल करती|
तुम चुप ही क्यों रह जाते?
हे पाहन!
तुम क्यों कभी नहीं मुसुकाते?
हे पाहन!

बारिश की वो पहली बूंदे,
चलती इठलाई जब नभ् से|
पत्ते पत्ते निरख बाट थक,
कर पसार तब स्वागत करते|
तुम तकते क्यों रह जाते?
हे पाहन!
तुम क्यों कभी नहीं मुसुकाते?
हे पाहन!

मलय समीर सुवाषित बहती,
कँट पात तरु झुक तब जाते|
दाह बढ़ाती रवि की किरणे,
थम जाती कुछ तब संकुचाते|
तुम स्यामल क्यों रह जाते?
हे पाहन!
तुम क्यों कभी नहीं मुसुकाते?
हे पाहन!

देखो खिला अवनि का हर कण,
कैसे हर क्षण यौवन खनके|
रोम रोम पुलकित नव जीवन,
जीवट सुधा श्रोत सम बनके|
तुम अधरों में कह जाते!
तुम अधरों में कह जाते!!
हे पाहन!
तुम भी कभी काश मुसुकाते!
हे पाहन!

-‘अरुण’
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14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/06/2016
  2. अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 21/06/2016
  3. आनन्द कुमार ANAND KUMAR 21/06/2016
  4. sarvajit singh sarvajit singh 21/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 21/06/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 21/06/2016
  6. C.M. Sharma babucm 21/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 21/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 21/06/2016
    • अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 21/06/2016
  7. अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 21/06/2016

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