सागर तट

सागर तट पर बैठ किनारे
तू बाट जोहता मेरी है
लौट रही क्या किश्ती मेरी
तू राह जोहता मेरी है।

तूने ही मेरी किश्ती को
जरजर काया दे रक्खी थी
टूटी-सी पतवार बिचारी
मेरे हाथों दे रक्खी थी

फिर प्रचंड तूफां को तूने
फुसलाया था, बिचकाया था
ऊँची उठती लहरों को भी
चुपके से जा उकसाया था

अब क्यूँ पछताता है तू ही
कुछ कुछ गल्ती तो मेरी है
अब क्यूँ उदास बैठ किनारे
तू बाट जोहता मेरी है।
सागर तट पर बैठ किनारे
तू बाट जोहता मेरी है
लौट रही क्या किश्ती मेरी
तू राह जोहता मेरी है।

हर्षित था वह हर क्षण मेरा
जब मैं लहरों से लड़ता था
पर हताश जब मुझको जाना
तू सुमरन किसका करता था

नतमस्तक था किसके आगे
लहरों या तूफां के आगे
पूज रहा था किसको मन में
माला जपता था किसके माने

चहूँओर तो तू ही तू है
हर मूरत सुन्दर तेरी है
इस सागर की बूँद बूँद में
जो छवि है बस तेरी है

मत हताश हो मेरे मालिक
यह किस्मत अपनी मेरी है
क्यूँ सागर तट पर बैठ किनारे
तू बाट जोहता मेरी है

डूब गया तो डूब गया पर
दोष नहीं मैं तुझको दूँगा
सागर की गहराई पाकर
तुझमें ही जाकर बैठूँगा

फिर चाहे तू कुछ भी कर ले
किश्ती को भी जीवित कर दे
और चलाकर उसे किनारे
सागर के तट लाकर रख दे

पर सागर की गहराई में
अविचलित शान्ति बस मेरी है
फिर क्यूँ तट पर बैठ किनारे
तू बाट जोहता मेरी है

देख रहा हूँ जाने कब से
तू बाट जोहता मेरी है
सागर तट पर बैठ किनारे
तू बाट जोहता मेरी है
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