बिलखती नदी टूटते पहाड़………………..(अनूप मिश्रा)

बिलखती नदियाँ टूटते पहाड़
हिमालय मे हो रहा नित मन्थन
सुनाई दे रहा नदियों का क्रन्दन
खो रहा घाटों का चैनो अमन……..फिर क्यों मौन हो रहे हैं हम
बाँज-बुरांश के पेड़ हों या चीड़-देवदार
सिमटते हुये झरने हों या टूटते हों पहाड़
नही रुक रहा बन रहे बाँधों का बहशीपन……फिर क्यों मौन हो रहे हैं हम
आ रही परियोजनायें काँप रहे हे ये पहाड़
खुद रही हैं सुरंगें उजड़ रहें हे गाँव बार-बार
नही रुक रहा लोगों का यहाँ से पलायन……..फिर क्यों मौन हो रहे हैं हम
बिलखती भागीरथी या रोती हो अलकनन्दा
प्रयागों की भूमी पर हो रहा पानी का धन्धा
नही देखा जाता उजड़ते गाँवों का ये रुँदन……..फिर क्यों मौन हो रहे हैं हम
उजड़ते गाँव लोग हो रहे दर-दर के भिखारी
बचाव कर रहे हैं बूढ़े, बच्चे हों या नर-नारी
सुन कर हालात है सरकार का कैसा बहरापन……..फिर क्यों मौन हो रहे हैं हम
गाँव गलियारे के लोग पहाड़ छोड़कर भाग गये
क्योंकि उनके घर भी तो डूब क्षेत्र मे आ गये
क्या इसी दिन के लिये किया था अलग राज्य का गठन
फिर क्यों मौन हो रहे हैं हम
(अनूप मिश्रा)

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/06/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/06/2016
  3. babucm C.m.sharma(babbu) 19/06/2016

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