धरती और नील गगन…………अनूप मिश्रा

एक दिन दुःखी होकर धरती ने कहा नील गगन से
देख अत्याचार मुझ पर तू भी तो दुःखी होता है मन मे
बस मुझ पर तू इतनी दया करना
अपने आगोश मे छुपे बादलों से कहना
कि तुम अब की बार जोरों से बरसना
ताकी हरा भरा हो जाये धरती का कोना
बोला नील गगन
तुझ पर यूँ ही अगर जंगल साफ होते जायेंगे
तो मेरे आगोश मे बादल मे कैसे बन पायेंगे
दया के बजाय तू अपने आपको इनसे बचा
लोगों को पेड़ लगाने का उपाय बता
बोली धरती लोग मुझ पर यूँ ही जुल्म करते जायेंगे
मेरे टुकड़ों को यूँ ही नीलाम करते जायेंगे
मेरी शरण मे रहने वाले पशु भी विलुप्त हो जायेंगे
धरती पर बोझ बनने वाले ही इंसान कहलायेंगे
ऐसे ही इंसान मुझे खोखला करते जाते हैं
और उसी के कारण मुझ पर भूकम्प आ जाते हैं
जब कई बेकसूर मारे जाते हैं
तो बदनाम धरती को ही कर जाते हैं
पर मत भूल एक दिन मै भी तेरे रंग मे मिल जाऊँगी
मै भी अपना अस्तित्व मिटा तेरे रंग मे समा जाऊँगी
हँस कर बोला नील गगन अरे पगली तू कैसे मुझ
मे मिल जायेगी
मै फिर भी विशाल गगन और तू धरती ही कहलायेगी
बोली धरती
गर यूँ ही लोग मुझे खोदते चले जायेंगे
तो मुझ पर असंख्य छिद्र हो जायेंगे
फिर मै पूरी तरह नीले सागर मे समा जाऊँगी
इसी तरह मै तेरे नीले रंग मे समा जाऊँगी

13 Comments

  1. अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 16/06/2016
    • anoop mishra anoop123 17/06/2016
  2. mani mani 16/06/2016
    • anoop mishra anoop123 17/06/2016
  3. आदित्‍य 16/06/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/06/2016
  5. अकिंत कुमार तिवारी 17/06/2016
  6. C.M. Sharma babucm 17/06/2016
  7. विजय कुमार सिंह 17/06/2016
    • anoop mishra anoop123 17/06/2016
  8. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 17/06/2016
    • anoop mishra anoop123 17/06/2016

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