कंकड़ पत्थर और रेत

घिसते रहे नदियाॅं तल में
जल प्रपात कितने सहे ।
बढ़ते रहे साथ में उनके
हम आघात कितने सहे ।।

मेरा ही तन टूटता रहा
मेरा ही दम घूटता रहा ।
पत्थर कंकड़ रेत वेष बदलकर
जाड़ा गर्मी बरसात कितने सहे ।।

मेरा ही षरीर बन गया व्यापार
षदियों से आज तक रहा लाचार ।
बेजान समझकर बेचते रहे हमें
बद से बत्तर हालात कितने सहे ।।

छत कभी दीवार में दबकर रह गये
उचें इमारतों में ऐसे जमकर रह गये ।
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारा चर्च भ्रम है
उल्टी सीधी बात कितने सहे ।।

उच्च षिखर पर्वत ताज हमारा था
पूरे विष्व में ही राज हमारा था ।
हमने देखे है कहर जुल्मो षितम
कलियुग के कारामात कितने सहे ।।

अजंता एलोरा एलिफेंटा ने रूप निखारा था
मोहनजोदड़ो और हडप्पा हमें ही निहारा था ।
सिंधू धाटी मेरे ही तन पर बसा
फिर ये युग संताप कितने सहे ।।

मेरा घर उजाड़कर अपना घर बसाया
धरती से निकालकर कितना सताया ।
व्यथा मन की किस किस को सुनाउ
इंसान के पाप अब कितने सहे ।।

बी पी षर्मा बिन्दु

Writer :- Bindeshwar Prasad Sharma (bindu)
D/O Birth :- 10.10.1963

6 Comments

  1. अरुण कुमार तिवारी arun kumar tiwari 16/06/2016
  2. mani mani 16/06/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 16/06/2016
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad Sharma (Bindu) 16/06/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 17/06/2016

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