जीवन की डोर

जीवन की डोर

जिन्दगी नीरस हो चली है
आशाएं धूमिल होने लगी हैं
मगर फि र भी ना जाने क्यों
डोर जीवन की बंधी हुई है ।
साहित्य की क्या खोज करूं
खुद जीवन मेरा खोया है
मैं क्या कोई कविता लिखूं
खुद अन्तर्मन मेरा रोया है ,
सोचता हूं तभी आज मैं
क्यों अश्रुधारा बह चली है ।
मगर फि र भी ना जाने क्यों
डोर जीवन की बंधी हुई है ।
आंखों में अश्रु हाथ में कलम
लिखना क्या है मुझको ये
कुछ भी ज्ञात नही है सनम
तभी तो बार-बार जहन में
उठता है सवाल जिन्दगी का
दिमाग से यादें मिट चली हैं ।
मगर फि र भी ना जाने क्यों
डोर जीवन की बंधी हुई है ।

2 Comments

  1. babucm babucm 15/06/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 15/06/2016

Leave a Reply