मन्नू : चतुर्दश अंक

मैंने उनसे प्रेम किया था
ह्रदय मे शास्वत स्थान दिया था

अक्सर उनको स्मरण करता था
कृष्णा के रोज चरण पड़ता था
जब भी अपना मेल हुआ था
अमृत प्रेम नयनो से पिया था

इस काया मे कैसी माया
एक एक क्षण मे कैसे जिया था

बिना प्राण जिया है कौन
क्षणभंगुर देह हो जाये मौन
उनकी दृटि का सम्मोहन
ले गया मुझसे मेरा मन

आज फिर यहाँ ब्याकुल बैठा हु
शायद सावन का मे पपीहा था

कभी न सावन फिर से आया
कभी न फिर स्वप्न सजाया
कुछ रहस्य हमको समझाया
खोकर भी कुछ हमने पाया

तासीर अमृत की और ही निकली
शायद बिष का एक प्याला पिया था
जो मैंने उनसे प्रेम किया था

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