परिंदे

उड़ते परिंदे को तुम ना रोको
मंजिल को पाना इन से सिखो।

सूरज की पहली किरन से ये तुमे कुछ कहते
हमारे जीवन में, ना जाने कितने रंग भर देते।

देखो अपना आशियां, ये कैसे बनाते
तिनको से अपना गुलिस्तां सजाते।

आसमां की बातो को तुम तक ये पहुंचाते
क्या कभी अपने लिये ये कुछ भी मांगते?

परिंदे जब हमें इतना कुछ बिना बोले देते
हम क्यों इनके साथ कुछ गलत कर देते।

परिंदे जिंदगी की नयी राह सिखाते
फिर क्यों हम इनको अपने घरो मे सजाते।
:-अभिषेक शर्मा

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 11/06/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/06/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 12/06/2016

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