आज की दुनिया

शोर बहुत है आज की दुनिया में ना जाने क्यों?
साबित करना है कौन किससे बेहतर है और क्यों,
मंदिर-मस्जिद की आवाज़ों तक से, रूह कापती है ,
ज़िंदगी से परेशां इंसा को आज, नींद कहाँ आती है ?

होड़ लगी है आगे निकलने की पर क्यों और कितना?
दाव पर लगा है सब कुछ, बचा नहीं पास एक तिनका,
रिश्ते-नाते तो दाव पर लगते ही आये है, कई ज़माने से,
इंसानियत भी खो चुके है हम आज, दो रोटी कमाने में।

बेईमानी बनी ज़रुरत, ईमानदारी हुआ रिवाज़ पुराना है ,
पूछता नहीं कोई किसीसे पाया कहाँ से ये खज़ाना है ,
जितना अधिक धन, सफल उतने ही आप कहलाएंगे,
अज्ञानी हो कर भी ज्ञानी को, ज्ञान बाँट कर आएंगे ।

चेत मानव पहचान कौन है तू ,और किस लिए जन्मा है?
आवश्यकता से अधिक धन संचय, विष का घूट भरना है,
क्यों बांटता है कटुता परिजनों में धन सम्पदा दिखाकर?
बाँट दे ज़रुरत मंदों में, मानव-सेवा माधव-सेवा अपनाकर।aaj kee duniya

4 Comments

  1. C.M. Sharma C.m. sharma(babbu) 11/06/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/06/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 11/06/2016
  4. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 12/06/2016

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