उत्पत्ती

मानव तन दानव मानव मन ही ज्ञान
एक तरफ इंसान और एक तरफ षैतान
मन मंदिर सत्य का मन ही करता पाप
मन ही सुनता है सही मन ही देता श्राप
श्रृश्टि की उत्पत्ती में आदी षक्ति महान
देवी देवता जनम लिये करने को उत्थान
फैल गया साम्राज्य एक बन गया संसार
लालच मन तब आया बदल गया विचार
राक्षस फिर जन्म हुआ जन्मे कुछ सैतान
साधू संत भी आ आये हो गये सब हैरान श्
षुरू हुई पहले पूजा होने लगी आराधना
भक्ति से वर मांगाा षुम्भ निषुम्भ रावणा
मनव भी क्या करे देवता देख ड़र जाए
राजनिति जन्म हुआ राक्षस मरे तर जाय
उत्पाती जन्म लिये अमर भया न कोय
साधू मुनी महात्मा निड़र भया न कोय
लड़ते लड़ते मर गये राक्षस कुल नास
राजनीति के खेल में मानव में ही वास
षक्ति थोड़ी कम हुई छुटा नहीं अपराध
धर्म अधर्म दो षम हुए बढ़ता रहा विवाद
सत्युग द्वापर त्रेता से अब तुमने क्या सिखा है
कर्म करो ए मानव तुम जो गीता में ही लिखा हैं बी पी षर्मा बिन्दु

Bindeshwar Prasad Sharma (Bindu)

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  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 12/06/2016

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