जाम, खड़े-खड़े विश्राम

जाम, जाम, जाम, खड़े-खड़े विश्राम,
जाम की बीमारी कितनी हो गई आम ।
शहर-शहर की राह-राह हो गयी मशहूर,
नजदीक-नजदीक में रहती फैली दूर-दूर ।
सड़कें-गलियां संकरी वाहन हो गए ढेर,
चार फेर के तेल में सब चले एक ही फेर ।
बारिस, गर्मी हो या शीत की शीतलता,
मौसम के थपेड़ों में कष्ट पाती भौतिकता ।
एम्बुलैंस की रोशनी या साइरन की हो बात,
जाम चले अपनी गति, दिन हो या रात ।
कुछ का जीवन बच जाता जो ये करता विश्राम,
कितने बीमारों की कर दी इसने उम्र तमाम ।
विलम्बित कर्मचारियों को अधिकारी बांचें ज्ञान,
उनकी नाराजगी जैसे तलवार हो बिना म्यान ।
तेल का आयात बढता, रुपये का कीमत गिरता,
सब्सिडी का बोझ, अर्थव्यवस्था पर चोट करता ।
करते तुम विश्राम, सबको मिलता आराम,
परिवहन का खर्चा बचता, घटता सामान का दाम ।
वायु में विष घोलते, बीमारी फैलाते सरेआम,
जाम, जाम, जाम, तेरा बस यही काम ।

विजय कुमार सिंह

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/06/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/06/2016
    • विजय कुमार सिंह 10/06/2016
  3. babucm babucm 10/06/2016
    • विजय कुमार सिंह 10/06/2016

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