गज़ल

इस षहर का मुझे भी अब चेहरा पढ़ना आ गया
गिरकर फिसले जमीं पे अब पर्वत चढ़ना आ गया ।
चोट खाकर जूल्म सहते रहे बहुत इस तरह जमाने से
दिले जुनून लेकर संहला अब जमाने से लडना आ गया ।
भागते रहे इस तरह जिंदगी से न कहीं ठीकाना मिला
होस अपना संहाला तो जिंदगी का रेल पकड़ना आ गया ।
फरेबों के चक्कर में हमनें भी बहुत ही धोखे खाये थे
अक्ल जब खुली मेरी तो मुझे अब संहलना आ गया ।
ठग इतने जिधर भी जाओ चापलुसी में लूट लेते हैं
वक्त रहते जमाने के साथ मुझे भी चलना आ गया ।
नफ़रत से भला रिष्ते आप निभा पायेंगे किस तरह
प्यार दिया जो आपने तो मुझे अब हंसना आ गया ।
इमान की बात करो क्योकिं खुदा के बंदे हो तुम
जो देखाना चाहा हकिकत वो सब सपना आ गया ।

बी पी षर्मा बिन्दु
Bindeshwar Prasad Sharma (Bindu)

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/06/2016
  2. mani mani 09/06/2016
  3. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/06/2016
  4. C.M. Sharma babucm 10/06/2016

Leave a Reply