दीमक

दीमक चट कर गई
मेहनत को मेरी
जिसमें संग्रह थी की गयीं
वो डायरी थीं मेरी
मिट्टी का पुलिंदा बना
सब खा गई डायरी मेरी
एक भी पन्ना न बचा
ऐसी किस्मत मेरी
कभी सोचा न था मैंने
ऐसा होगा कभी
सुरक्षित रखी थी मैनें
शीशे में बंद डायरी
विचार बना जब लिखने को
निकालने को हुआ डायरी
ऐसा झटका लगा जिया को
शुध – बुध खो गई मेरी
याद आते हैं पल वो
जब रची थी कविता मेरी
सोचा था नेट पे डालने को
पर बहुत हो गई देरी
कैसी – कैसी कविता मैनें
रची थी जीवन में मेरी
धोखा खाया ऐसा मैनें
की दीमक खा गयीं डायरी मेरी

देवेश दीक्षित
9582932268
दीमक

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/06/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/06/2016
  3. babucm babucm 10/06/2016

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