कमल की कलम : भाग 6

बारिश की बूंदे
कैद थीं जो
बादलों के पिंजरे में
हो गई आजाद है
रिमझिम यह
जल तरंगों की
नहीँ इंसानों का मेला
ढूँढ़ रहा बेमौसम
जो दंगा फ़साद है॥

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