कमल की कलम : भाग 5

बेमौसम सावन भी मझधार पे आया
मोहब्बत-ए-पैगाम महबूब का आया
हम तरसते रह गये दीदार-ए-हुस्न को
तराना-ए-इश्क जो फिजाओं ने गाया॥

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