कमल की कलम : भाग 3

वो सूरज की तपीश
हर वक़्त गुजरती रही

बादलों की अंगड़ाई
जाने क्यों सख्त हुई

क़दम रौंदते रहे
ओँस के पैमानों को

गहराइयों की जंग में
जिंदगी कमबख्त हुई॥

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