गुरुर

गुरुर इंसान का खुद को खा जाता है l
बुरा समय कभी कह के नहीं आता है ll
आज तेरा कल औरो का समय आएगा l
क्यों करते हो गुरुर,सब यही रह जाएगा ll

पल दो पल की जिंदगी, हँस के बिता लें l
ना जाने कब सांसे अपना पीछा छुड़ा लें ll
नफरत के बीज बोकर क्या मिल जाएगा l
क्यों करते हो गुरुर,सब यही रह जाएगा ll

सोना, चांदी, बंगला या हो नौकर चाकरl
भूख मिटेगी सिर्फ गेंहू की रोटी खाकर ll
सोने का टुकड़ा भूख नहीं मिटा पाएगा l
क्यों करते हो गुरुर,सब यही रह जाएगा ll

रूप पर गुरुर, ये एक दिन ढल जाएगा l
पैसो पर गुरुर, ये तेरे साथ नहीं जाएगा ll
शरीर नश्वर है, ये मिट्टी में मिल जाएगा l
क्यों करते हो गुरुर, सब यही रह जाएगा ll

फिर भी ……………………….

जब हो जाये तुम पर ये हावी गुरुर l
चले जाना एक बार शमशान जरूर ll
सच तुम्हें खुद-बे खुद नज़र आएगा l
उसी समय ये गुरुर पिघल जाएगा ll

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6 Comments

  1. विजय कुमार सिंह 09/06/2016
    • Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 09/06/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/06/2016
  3. Rajeev Gupta RAJEEV GUPTA 09/06/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/06/2016
  5. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 10/06/2016

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