बरसात

बरसात

मंद-मंद लगी गिरने फुहार,
शीतल होकर बहे ये बयार ।
चारों तरफ हरियाली फैली
पेड़ निढ़ाल खड़े चहुं ओर
चारों तरफ सुनसान है सब
भंभिरियों ने मचाया है शोर
ऐसे मौसम में काली रात को
छोड़ घर घुमने चले सियार ।
मंद-मंद लगी गिरने फु हार,
शीतल होकर बहे ये बयार ।
पे्रमी जन मिलने को आतुर
अपने मन के प्रिये सहजनों से
चेहरा जैसे उदास सा हो गया
शोक विह्वल से सभी हो उठे
भर-भर अंजली बिखेर रहे पानी
इन्द्र देव बने है कैसे दातार ।
मंद-मंद लगी गिरने फु हार,
शीतल होकर बहे ये बयार ।