चल मुसाफिर

करोगे जैसा फल पाओगे आज नहीं तो कल
चल मुसाफिर चल मुसाफिर चल मुसाफिर चल
रूकना अब है नहीं संभव सब जायेगा निकल
चल मुसाफिर ।
सत्य अहिंसा न्याय से बढ़कर कुछ भी नहीं है दूजा
धर्म ध्यान और ज्ञान से बढ़कर कोई नहीं है पुजा
मनवता है प्रेम से रहना प्रेम ही सबका हल
चल मुसाफिर ।
ऐसा काम नहीं कुछ करना दुनिया हंसेगी सारी
मानव का तन कितना प्यारा उसमें उत्तम नारी
कर्म से बड़ा नहीं कुछ भी रखना याद हर पल
चल मुसाफिर ।
भटका जो माया में पड़कर बच न पाया कोई
दाग लगे अगर दामन में मिटा न पाया कोई
अब जागो अब तो संहलो जाना मत फिसल
चल मुसाफिर ।
सबकुछ तेरे ऑख के आगे सबकुछ तेरे पास
सारा समंदर पानी पानी फिर भी मिटा न प्यास
इतना सारा देख समझकर कब आयेगी अकल
चल मुसाफिर ।

बी पी षर्मा बिन्दु

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