लंका फतह

ढ़ोल मृदंग करताल बाजे सारंगी
लंका फतह में नाचे देखो बजरंगी
सीता साथ में लेके राम लखन जब आये थे
वर्शो बाद अयोध्या वासी देखो तो हर्शाये थे
जगमग जगमग दीप जले सतरंगी
लंका फतह में ।
राजा बन गये रामचंद्र रानी बन गई जानकी
मर्यादा पुरूशोत्तम कांपे धोबी ने अपमान की
विधाता का खेल निराला बात बनाई बातंगी
लंका फतह में ।
त्याग दिये सीते को ऐसे जैसे कंकड़ चावल का
कलंकनी बन गई सीते अग्नि परीक्षा रावण का
धोबिया रह रह मुस्काय खाये नारंगी
लंका फतह में ।
बन गई वणवासीनी सीता जनक की राजदुलारी थी
दिल पर पत्थर रख ली सीता रामचंद्र की प्यारी थी
दया धर्म का रूप देखो अब सतरंगी
लंका फतह में ।

बी पी षर्मा ;बिन्दु

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